अंतर्वेदना

अभी तक ये ब्लॉग मेरी माँ ने संभाला था लेकिन इस बार जब मेरे काम की दृष्टि से इसके उपयोग को उन्होंने बताया तो मैंने इसको खुद ही लिखने का संकल्प लिया है और आशा करती हूँ कि मेरे द्वारा दी गयी जानकारी आप सबके लिए उपयोगी साबित होगी. हो सकता है कि आप या आपके आस पास के लोग जानकारी के अभाव में सही दिशा में न जा रहे हों तो इससे सही दिशा मिल सके मेरे लेखन की इसी में सफलता होगी.

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021

यंग ब्लड !

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                           हॉस्पिटल के मैनेजमेंट की मीटिंग चल रही थी।  एचआर  निधि से प्रगति और समस्या के बारे में पूछा है रहा था।           ...
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सोमवार, 13 मई 2013

बेटी का माँ को सन्देश !

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 कल रात मुझे ये एस एम एस मिला मेरी बेटी सोनू का , और जब उसको पढ़ा तो आंसू अपने आप गिरने लगे कोई बेटी अपनी माँ से ऐसा कहती है कहा तो बोली आप ...
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बुधवार, 19 दिसंबर 2012

डर या साहस !(kavita)

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माँ मेरी माँ   मैं सबसे दूर बैठी  अब टीवी नहीं देखती  सबकी आवाजें  मेरे कानों में  गरम शीशे की तरह  पिघल कर बह रही होती है। अपनी उस...
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शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

ये कैसा दशहरा ?

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                          दशहरा जब से कानपुर  से बाहर  निकले हैं तब से देखा ही नहीं है , नहीं अपनी सहेलियों के साथ अरमापुर का दशहरा देखने ...
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गुरुवार, 27 सितंबर 2012

माँ मेरी माँ !

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चित्र गूगल के साभार ( कुछ मानसिक असामान्यता के शिकार बच्चे ) माँ  वह शब्द है जिसके गोद में सिर  रख कर  भूल जाते हैं हर गम . ...
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बुधवार, 6 जून 2012

बोलीवुड स्टाइल

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बहुत गंभीर रहते  रहते लगा कि सारे दिन उन मासूम से बच्चों के साथ रहते रहते कुछ रिलेक्स होने का मन  और बीमारियों का पोस्ट मार्टम कर डाला जाय ...
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शनिवार, 21 मई 2011

ओ मेरी माँ !

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ये कविता उन सभी माँओं को समर्पित है, जो ऐसा जीवन जी रही हैं या फिर जी चुकी हैं। फिर भी कभी अपने अधिकारों और अपने लिए कुछ बोल नहीं पायीं हैं...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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